द्विराष्ट्र सिद्धांत के प्रबल विरोधी महान स्वतंत्रता सेनानी अब्दुल कय्यूम अंसारी को भारत रत्न देकर ही सच्ची श्रद्धाजंली होगी
अब्दुल कय्यूम अंसारी की 121 वीं जयंती पर विशेष आलेख

द्विराष्ट्र सिद्धांत के प्रबल विरोधी महान स्वतंत्रता सेनानी अब्दुल कय्यूम अंसारी को भारत रत्न देकर ही सच्ची श्रद्धाजंली होगी
01 जुलाई : अब्दुल कय्यूम अंसारी की 121 वीं जयंती पर विशेष आलेख
अब्दुल कय्यूम अंसारी एक महान स्वतंत्रता सेनानी थे । जिन्होंने देश की आजादी और फिर आजादी के बाद देश के बटवारे के खिलाफ मुखर होकर आवाज उठाई । उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका निभाई, लेकिन इतिहास के पन्नो में उनको जितना जिक्र होना चाहिए उतना नहीं हुआ । अब्दुल कय्यूम अंसारी राष्ट्रीय एकता, धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिक सद्भाव के लिए जाने जाते थे । उन्होंने भारत से एक स्वतंत्र राज्य के रूप में एक अलग मुस्लिम राष्ट्र के निर्माण का खुले तौर पर विरोध करके मुस्लिम लीग की मांग के खिलाफ मुखर होकर आवाज बुलंद किया था । अब्दुल क़य्यूम अंसारी ने अखिल भारतीय मोमिन कॉन्फ्रेंस के माध्यम से जिन्ना के द्विराष्ट्र सिद्धांत के खिलाफ लड़ाई लड़ी । वे एक महान देशभक्त, सफल राजनीतिज्ञ व कूटनीतिज्ञ होने के साथ-साथ एक महान पत्रकार, लेखक, कवि और समाज सुधारक भी थे । आजादी से पहले उन्होंने उर्दू साप्ताहिक “अल-इस्लाह” (सुधार) और एक उर्दू मासिक पत्रिका “मसावात” (समानता) निकाली जिसके वे संपादक भी थे । वे पिछड़े समाज को लेकर बहुत चिंतित रहते थे । वे मुस्लिम लीग की साम्प्रदायिक और उदारवाद नीतियों के खिलाफ थे । 1937 और 1938 के बीच उन्होंने मोमिन कॉन्फ्रेंस की स्थापना की और 1946 में बिहार विधान सभा चुनाव में 6 सीटें जीतकर इतिहास रचा । इतना ही नहीं उन्हें बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्री कृष्ण सिंह के मंत्रिमंडल में मंत्री पद भी दिया गया, इस तरह उन्होंने लगातार 17 वर्ष तक यानी आखरी साँस तक मंत्री के रूप में कार्य किया । जिसकी प्रशंसा बिहार केसरी श्री कृष्ण सिंह और बिहार विभूति अनुग्रह नारायण सिंह दोनों ने की है । अक्टूबर 1947 में कश्मीर पर पाकिस्तान के आक्रमण के दौरान भारत के पहले मुस्लिम नेताओं के रूप में उभरे जिन्होंने पाकिस्तान की खुल कर विरोध किया और मुस्लिम जनता को भारत के लिए देश प्रेम का जज्बा भर कर अपनी आक्रामकता का मुकाबला करने के लिए उकसाया और देशभक्त बन कर दिखाया । आजाद कश्मीर को स्वतंत्र कराने के लिए 1947 में इंडियन मुस्लिम यूथ कश्मीर फ्रंट का गठन भी किया । बाद में उन्होंने 1948 में हैदराबाद के रजाकारों के भारत विरोधी विद्रोह में भारतीय मुसलमानों को भारत सरकार का समर्थन करने के लिए प्रोत्साहित किया । पसमांदा (पिछड़ा मुस्लिम) समाज से आने के कारण अब्दुल क़य्यूम अंसारी को काफी संघर्षों का सामना भी करना पड़ा । फिर भी वे अपने मिशन में लगे रहे और काफी उत्साह के साथ अपना काम करते रहे । जिस प्रकार बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर दलितों और पिछड़ों के मसीहा रहे उसी प्रकार अब्दुल क़य्यूम अंसारी मुस्लिम समाज के दलितों और पिछड़ों के साथ-साथ हिन्दू सहित बाकी अन्य समाज के शोषित, वंचित, कमजोर, पिछड़े, दलित के लिए जीवन भर संघर्ष करते रहे । उनकी कड़ी मेहनत का ही नतीजा था कि उनके संघर्ष और उनके धारदार आंदोलन के कारण भारत सरकार ने 1953 में अखिल भारतीय पिछड़ा वर्ग आयोग बनाया था । अब्दुल क़य्यूम अंसारी का जन्म एक जुलाई 1905 को बिहार राज्य के डेहरी ऑन सोन के एक जमींदार परिवार में हुआ था । उन्होंने अपनी प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा डेहरी और सासाराम में लिया । फिर उच्च शिक्षा कोलकता यूनिवर्सिटी, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी और अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में पूरी की । वे एक युवा नेता के रूप में कांग्रेस के साथ मिल कर काम किया और 1929 में कोलकता में साईमन कमीशन के खिलाफ आंदोलन में भी भाग लिया और मात्र 16 साल की उम्र में देश की आजादी के लिए जेल गए । ऐसा माना जाता है कि भले ही वह एक समृद्ध परिवार से थे लेकिन हमेशा पिछड़ों के लिए संघर्ष करते नजर आए । जबकि आज के 30 साल के युवा भी देश के लिए इतना नही सोचते हैं जो सम्पन्न होते हैं । जबकि वे हर तरह से सम्पन्न होने के बाद भी मात्र 16 साल के उम्र में देश के लिए घोर चिंता करते थे । बाबा -ए- कौम अब्दुल कय्यूम अंसारी के एक-एक शब्द और उनके कायों एवं सिद्धांतों से अवगत कराना नई पीढ़ी को बहुत ही जरूरी है । उनका देहांत 18 जनवरी 1973 ई. को 67 साल की उम्र हुआ था । जब वे बाढ़ पीड़ित लोगों के प्रवास के लिए निरीक्षण कर रहे थे, यानी आखरी साँस तक जनसेवा करते जनता के बीच ही दुनिया को अलविदा कह दिया । आज हम उनकी यौम -ए- पैदाईस (जन्म दिवस) की 121 वीं जयंती मना रहे हैं । लेकिन आज भी वह इतने महान स्वतंत्रता सेनानी होकर भी उपेक्षित हैं । उनका पैतृक निवास आज खंडहर हो चुका है और जर्जर होकर ध्वस्त होने के कगार पर है । जिसके लिए सरकार को चाहिए की वह उस निशानी को बचाने के लिए पहल करते हुए पुरात्व विभाग को सौंपे ताकि उसे संरक्षित किया जा सके । हाँ ये जरूर है कि बिहार सरकार केवल उनके जन्मदिन 01 जुलाई को राजकीय स्तर पर मना कर उनके चित्र पर माल्यार्पण कर खानापूर्ति कर लेती है, लेकिन ये काफी नही है । उनका जन्मदिन और पुण्यतिथि सम्पूर्ण भारत मे सरकारी स्तर पर मनाने की घोषणा होनी चाहिए । हाँ ये जरूर है कि भारत सरकार ने उनकी याद में 01 जुलाई 2006 को उनके नाम पर केवल एक डाक टिकट जारी किया था लेकिन एक ऐसे सच्चे देशभक्त के इतना काफी नही है । स्वतंत्रता संग्राम के भूले-बिसरे नायक, महान देशभक्त, शोषितों, वंचितों, मजलूमों के मसीहा अब्दुल कय्यूम अंसारी को भारत रत्न आवश्य मिलनी चाहिए । भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में तो कई नाम चमकते हैं लेकिन कुछ नायक गुमनानी में ही रह जाते हैं । उनके योगदान नजर अंदाज कर दिए जाते है और उनके बलिदान को भुला दिया जाता हैं । स्वतंत्रता से पहले और स्वतंत्रता के बाद भारत के ताने-बाने में उनके विशाल योगदान के बावजूद उनका नाम महान भारतीय नेताओं की सूची में शायद ही कभी लिया जाता है । इसलिए उनके योगदान को देखते हुए उन्हें भारत रत्न मिलना चाहिए । क्योंकि बाबा -ए- कौम अब्दुल कय्यूम अंसारी एक भूले-बिसरे नायक थे । जिनकी अडिग भावना और अथक प्रयासों ने भारत के स्वतंत्रता और समानता के संघर्ष को एक बड़ा आकार दिया है । उनके विशाल योगदान और राष्ट्रीय एकता, धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय के लिए उनकी निरंतर वकालत के लिए उनको भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान “भारत रत्न” की योग्यता को रेखांकित भी करती है ।
रोजनामा इंडो गल्फ़ /एनाएतुल्लाह नन्हे




