
क्या गाय से आस्था भी महज़ राजनीतिक है
— शोएब रज़ा फ़ातमी

अब यह देश नागपुर प्रेरित उस व्यवस्था के अनुसार चल पड़ा है जिसे यहाँ तक पहुँचाने में लगभग सभी विपक्षी दलों ने भी अपना योगदान दिया है। अब देश की सबसे बड़ी अल्पसंख्यक आबादी के लिए सरकार ने एक निश्चित भूमिका तय कर दी है—आप अधिक से अधिक शोर मचाते रहिए और भाजपा अपने समर्थकों से कहती रहेगी, “देखो, मुल्ला कैसे बिलबिला रहा है। हमने पहले ही कहा था कि इनकी चूड़ियाँ टाइट कर देंगे, सो कर दीं।”
यह बहुसंख्यक समाज से किया गया एक राजनीतिक वादा था और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार अपने समर्थकों की नज़र में उस वादे पर खरी उतरती दिखाई दे रही है। शायद यही कारण है कि भाजपा राज्य दर राज्य चुनाव जीतती चली जा रही है। और आप बस विरोध करते रहिए!
एक और बात स्पष्ट कर दूँ कि नफ़रत के इस दौर में केवल मुसलमानों का ही नुकसान नहीं हुआ है। देश के बड़े-बड़े सरकारी संस्थान और उनकी संपत्तियाँ ही नहीं बिकीं, बल्कि गंगा-जमुनी तहज़ीब की सबसे बड़ी पहचान उर्दू भाषा की जड़ें भी खोद दी गईं। लेकिन इस पर भी सबसे ज़्यादा आवाज़ मुसलमानों की ही सुनाई देती है।
समझ में नहीं आता कि वे उर्दू लेखक और शायर कहाँ गुम हो गए जो लगातार यह कहते और लिखते रहे कि उर्दू केवल मुसलमानों की भाषा नहीं है। वे इसके समर्थन में एक लंबी सूची भी पेश करते थे कि किस प्रकार अनेक गैर-मुस्लिम साहित्यकारों ने भी उर्दू की सेवा की। लेकिन अचानक वे सब कहाँ चले गए? उनकी अगली पीढ़ियों में भी कोई दिखाई नहीं देता।
कारण बिल्कुल स्पष्ट है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शुरू से ही उर्दू को विदेशी भाषा मानता रहा है। उसके नेता बार-बार कहते रहे हैं कि इसकी लिपि फ़ारसी मूल की है। इसलिए सरकार उर्दू के विकास के लिए उतना ही प्रयास करेगी जितना वह मुसलमानों के लिए करती है। आप लोग उर्दू ज़िंदाबाद, लोकतंत्र ज़िंदाबाद और धर्मनिरपेक्षता अमर रहे के नारे लगाते रहिए, और सत्ता इन्हें भी अपने प्रचार तंत्र का हिस्सा बनाकर इस्तेमाल करती रहेगी।
इन दिनों पूरे देश, विशेषकर हिंदी पट्टी में, गाय को लेकर ज़ोरदार बहस चल रही है। लेकिन क्या आपने कहीं यह भी सुना कि गायों के लिए जो सरकारी चरागाह कभी हुआ करते थे और जिन्हें ग्राम पंचायतों की निगरानी में रखा गया था ताकि वहाँ पशुओं के लिए चारे और पानी की व्यवस्था हो सके, वे आज कहाँ हैं? उन्हें ढूँढना भी मुश्किल हो गया है।
क्या गाय को पशु के बजाय “माता” कहने वालों की ज़ुबान या कलम से आपने कभी गोचर भूमि की बात सुनी? क्या किसी सरकार ने ऐसी कोई मुहिम चलाई जिसमें गायों के लिए आरक्षित चरागाहों की पुनर्बहाली भी एजेंडे में शामिल हो? क्या किसी विपक्षी दल ने यह सवाल उठाया कि लाखों एकड़ गोचर भूमि आखिर गई कहाँ?
और आज गायें कूड़ा और प्लास्टिक खाकर क्यों मर रही हैं?
कारण भी स्पष्ट है। इन ज़मीनों पर कब्ज़ा करने वालों में बड़ी संख्या उन्हीं लोगों की है जो स्वयं को गोभक्त कहते हैं। ऐसी ज़मीनों को वापस लेने की मुहिम चलाने से राजनीतिक नुकसान हो सकता है और वोटों पर असर पड़ सकता है। इसलिए गाय की वास्तविक समस्या पर बात कम होती है और भावनात्मक नारों पर अधिक।
भारत एक ऐसा देश है जहाँ आस्थाओं, परंपराओं और सांस्कृतिक प्रतीकों को विशेष महत्व प्राप्त है। गाय भी उन प्रतीकों में से एक है जिसे करोड़ों हिंदू श्रद्धा और सम्मान की दृष्टि से देखते हैं। इस आस्था का सम्मान लोकतांत्रिक समाज की मूल आवश्यकता है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या राज्य की नीतियों और कानूनों का आधार केवल आस्था हो सकता है?
हाल ही में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि “हमने गाय को माता माना है, जो गाय माता को पशु कहते हैं उनकी सोच पशुवत है।” यह कथन अपने भीतर एक महत्वपूर्ण विरोधाभास समेटे हुए है। वैज्ञानिक और जैविक दृष्टि से गाय एक पशु है, जबकि “माता” का दर्जा धार्मिक और सांस्कृतिक श्रद्धा का प्रतीक है। इन दोनों बातों में कोई टकराव नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब आस्था को वैज्ञानिक तथ्य के सामने खड़ा कर दिया जाता है और असहमति रखने वालों की नीयत या बुद्धि पर प्रश्नचिह्न लगाया जाता है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में राज्य का दायित्व आस्थाओं का सम्मान करना है, न कि किसी एक आस्था को सभी नागरिकों पर वैचारिक मानक के रूप में थोपना। यदि कोई व्यक्ति गाय को धार्मिक सम्मान का प्रतीक मानता है तो उसे इसका पूरा अधिकार है। लेकिन यदि कोई दूसरा व्यक्ति उसे जैविक वर्गीकरण के अनुसार एक पशु कहता है तो उसे भी अपनी बात कहने का अधिकार होना चाहिए। लोकतंत्र की खूबसूरती इसी विविधता में है।
दिलचस्प बात यह है कि गाय के नाम पर सबसे अधिक राजनीति उसी देश में हुई है जहाँ लाखों आवारा पशु सड़कों पर भूखे भटक रहे हैं। यदि गाय वास्तव में “माता” है तो सबसे पहले उसके लिए बेहतर आश्रय, चारे की व्यवस्था, पशु चिकित्सा सुविधाएँ और किसानों को आर्थिक सहायता सुनिश्चित की जानी चाहिए। केवल भावनात्मक नारे और राजनीतिक बयान गायों का संरक्षण नहीं कर सकते।
यह भी एक सच्चाई है कि गाय की पवित्रता के नाम पर कई बार सामाजिक तनाव पैदा हुआ, जबकि स्वयं गायों के कल्याण का मुद्दा पीछे छूट गया। इससे यह धारणा बनती है कि कुछ लोगों के लिए गाय एक सामाजिक और आर्थिक प्रश्न कम तथा एक राजनीतिक प्रतीक अधिक बन चुकी है।
कानून का उद्देश्य सभी नागरिकों के अधिकारों और हितों की रक्षा करना होता है। यदि गायों के संरक्षण के लिए बेहतर कानून बनाए जाएँ, पशुओं पर अत्याचार के विरुद्ध सख्त कार्रवाई हो और पशुपालकों की सहायता की जाए, तो इससे निश्चित रूप से सकारात्मक परिणाम मिलेंगे। लेकिन यदि कानून का उद्देश्य केवल धार्मिक भावनाओं के आधार पर सामाजिक श्रेणियाँ बनाना हो, तो प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
अंततः यह समझना आवश्यक है कि सम्मान और आलोचना एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। गाय के प्रति श्रद्धा रखने वालों की भावनाएँ सम्माननीय हैं, लेकिन लोकतांत्रिक समाज में किसी भी आस्था पर प्रश्न उठाने या उसकी वैकल्पिक व्याख्या करने का अधिकार भी उतना ही महत्वपूर्ण है। राज्य की जिम्मेदारी आस्था और संविधान के बीच संतुलन स्थापित करना है, न कि एक को दूसरे पर थोपना।
गायों की रक्षा का सबसे प्रभावी मार्ग भावनात्मक नारों से नहीं, बल्कि व्यावहारिक उपायों, वैज्ञानिक योजना और सामाजिक सद्भाव से होकर गुजरता है।




