डिजिटल दौर में किताबों से दूरी : अगली पीढ़ी के लिए भारी नुकसानदेह
ग्लोबल विलेज के डिजिटल दौर में आज कल की नई पीढ़ी किताबों से काफी दूर होती जा रही हैं ।

डिजिटल दौर में किताबों से दूरी : अगली पीढ़ी के लिए भारी नुकसानदेह

रोजनामा इंडो गल्फ़
वरिष्ठ स्तम्भकार
एनाएतुल्लाह नन्हे
ग्लोबल विलेज के डिजिटल दौर में आज कल की नई पीढ़ी किताबों से काफी दूर होती जा रही हैं । वह किताब को देखना, पढ़ना और पलटना ही नही चाहती है, बल्कि डिजिटल दौर की विभिन्न प्लेटफॉर्म पर दौड़ रही वीडियो को स्क्रोल कर रही है, जिसमे 95 फीसद कन्टेंट का कोई प्रमाणिकता नही होती, वह हवा-हवाई होती है । आज के बच्चों की कौन कहे अब तो नौजवान भी किताब पढ़ने से दूर भाग रहे हैं । डिजिटल दौर के सोशल मीडिया के नशा को रोकना होगा और किताब को पढ़ने के लिए प्रेरित करना होगा । कारण की किताब सर्टिफाइड होता है, जो शिक्षा जगत से जुड़ी शिक्षाविद द्वारा काफी शोध के बाद प्रमाणिकता मिलने के बाद ही किताब को प्रकाशित किया जाता है । किताब पढ़ने से ये फायदा होता है की जो चीज आप को समझ नही आती है, उसे दो से चार बार पढ़ने के बाद मस्तिष्क में समाहित हो जाता है । किताब पढ़ने से जहाँ ज्ञान में वृद्धि होती है वहीं दिमाग को भी सकून मिलता है । जबकि डिजिटल दौर के प्लेटफॉर्म पर चल रहे विभिन्न सोशल साईट के कंटेंट्स, वीडियो और क्लिप इतनी स्पीड में होते होते हैं कि वह सर के ऊपर से निकल जाते हैं । अगर आप को कहीं उस विषय मे कुछ ऊटपटाँग सा नजर भी आए तो आप उसका जवाब तालाश नही कर सकते हैं । जबकि किताब पढ़ने से ये फायदा होता है कि आप को किसी विषय के संदर्भ को ज्यादा समझना है या बिल्कुल समझ ही नही आ रहा है, तो आप उस के आंतरिक संदर्भ (इंडेक्स) में जाकर बिल्कुल आसानी से समझ सकते हैं । उस विषय से जुड़ी विभिन्न किताबों, लेखकों और विचारकों के अलग-अलग मत को अलग-अलग सन्दर्भ में दिए गए कथन का अध्यन कर आप खुद निष्कर्ष निकाल सकते हैं । डिजिटल प्लेटफॉर्म पर समय व्यतीत करने वाले लोगों में आज बच्चे और युवा ही नही हैं बल्कि वृद्ध भी शामिल हैं । किताब से अच्छा तो कोई दोस्त हो ही नही सकता है, यह आप के मस्तिष्क को रिफ्रेश करता है यानी तरो-ताजा रखता है । अगर आप तनाव, अवसाद, घबड़ाहट, बेचैनी या अन्य किसी भी प्रकार के मामलों में अगर आप अकेले पड़ गएं हैं, और कोई आप को साथ नही दे रहा या खुद तनाव के कारण आप किसी से मदद लेना भी नही चाहते हैं, तो सिर्फ और सिर्फ किताब का सहारा लीजिए । किताब का सहारा लेने से आप को किसी का एहसानमंद भी नही बनना पड़ेगा । ब्रिटेन से निकलने वाले विश्व प्रसिद्ध दैनिक समाचार पत्र ‘द टेलीग्राफ’ ने अपनी एक सम्पादकीय रिपोर्ट में लिखा है कि आज के परिवेश में बच्चों और युवकों में किताब नही पढ़ने का ग्राफ सबसे नीचे पायदान पर पहुँच चुका है, जो अब तक का सबसे खराब रेंक (स्तर) है । वहीं दूसरी ओर फ्रांस की राजधानी पेरिस की चर्चित संस्था ओ.ई.सी.डी. ने एक सर्वे किया जिसमें उसने लगभग दुनिया के आधे देश यानी 91 देशों में 7 लाख 60 हजार बच्चों पर किताब के पढ़ने के रुझान पर चर्चा की तो बहुत ही हैरान करने वाली रिपोर्ट सामने आई । रिपोर्ट बताती है कि 15 वर्ष तक के बच्चे को किताब पढ़ने में कोई दिलचस्पी नही थी, इतना ही नही शोध में यह भी सामने आया कि किताब नही पढ़ने की इस शदी की सबसे खराब पोजिशन बताई गई । साथ ही उस सर्वे रिपोर्ट में यह भी साफ हुआ है कि बच्चे गणित (मैथ) और विज्ञान (साइंस) पढ़ने से गुरेज करते नजर आ रहे हैं। इंग्लैंड के कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की एक अन्य शोध रिपोर्ट में यह भी बताया गया है की मन लगाकर और शौक से किताब पढ़ने वाले व्यक्ति को डिमेंशिया जैसे रोग जिसमे याददाश्त कमजोर होना, भ्रम जैसी स्थिति बनना, संचार साधने में परेशानी होना, व्यवहार में अमूलचूल परिवर्तन और बदलाव आना जैसे लक्षण में एक तिहाई तक कमी हो सकती है। अंततः मैं बिहार राज्य के सीवान जिला का रहने वाला एनाएतुल्लाह नन्हे यही कहूँगा की किताबों से लगाव बनाए रखने के लिए किताब क्यों पढ़ें ? किताब पढ़ना जरूरी क्यों ? और किताब पढ़ने से क्या फायदा ? जैसे जागृति पैदा करने वाले विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम आयोजित होते रहना चाहिए, जिससे किताब के प्रति फिर से लोगों का रुझान बढ़ें । याद रखिए जो किताब पढ़ेगा, वही आगे बढ़ेगा, सोशल मीडिया पर सिर्फ वीडियो स्क्रॉल करने से आप अपने पुर्वजों के इतिहास और संस्कृति से अवगत नही हो सकते हैं । उसके लिए सबको पढ़ना होगा, पढ़ना होगा और किताब को पढ़ना होगा ।



