ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान : जिन पर सम्पूर्ण भारत को नाज है
भारत देश में एक ऐसे सैन्य अधिकारी रहे हैं, जो परतंत्र भारत में अंग्रेजी राज्य में ब्रिटिश फोर्स में भी सेवा दी और आजादी के बाद देश की भी सेवा की है ।

ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान : जिन पर सम्पूर्ण भारत को नाज है
भारत देश में एक ऐसे सैन्य अधिकारी रहे हैं, जो परतंत्र भारत में अंग्रेजी राज्य में ब्रिटिश फोर्स में भी सेवा दी और आजादी के बाद देश की भी सेवा की है । उनकी सैन्य पराक्रम से पूरे भारतवासियों को नाज है। आज 15 जुलाई को उनका 114 वीं जन्मदिवस है। जो सन 1912 ई. को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिला के बीबीपुर गाँव में माता जमीरुन निशा और पिता खान बहादुर मोहम्मद फारूक के घर पैदा हुए थे। ये बच्चन से ही काफी बहादुर थे। बताया जाता है कि जब वह मात्र 12 साल के थे तो कुए में गिरे एक बच्चे को कुंए में छलांग लगा कर बचाया था। ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान की प्रारम्भिक शिक्षा बनारस में हुई, जबकि वे उच्च शिक्षा लेने इंग्लैंड गए जहाँ उन्होंने सैंडहर्स्ट स्थित रॉयल मिलिट्री एकेडमी में सैन्य शिक्षा ग्रहण की और भारत लौटने के बाद ब्रिटिश फौज में कमीशन प्राप्त किया। उस दौर में अंग्रेजों की सेना में भारतीयों का बड़े ओहदे पर जाना आसान नहीं था। किन्तु उनकी उर्दू भाषा पर जबरदस्त पकड़ और कौशल विकास की असीम दक्षता के कारण उन्हें ब्रिटिश सेना में अफसर का पद मिलना उनकी काबलियत की बहुत बड़ी पहचान थी। वे बलूच रेजिमेंट की कमान के साथ-साथ कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों को भी निभाते का काम किया। वे अंग्रेजी फौज में सेकंड लेफ्टिनेंट से होते हुए कैप्टन और फिर मेजर के पद तक पहुंचे थे। जो कि एक भारतीय के लिए फिरंगियों की फौज में इतनी बड़ी जगह बनाना आसान नहीं था। यह एक हिन्दुस्तानी के लिए बहुत बड़ी बात है। ये वही ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान हैं जिन्हें देश की आजादी के बाद बंटवारे में बने पाकिस्तान में शामिल होने के लिए मुस्लिम होने की दुहाई और जज्बाती बयान देकर बरगलाने की भरपूर कोशिश की गई। इतना ही नही पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना और पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान ने पर्सनल चिठ्ठी लिख कर भेजा की वह पाकिस्तान में शामिल हो जाएं। साथ ही मुसलमान कार्ड खेल कर पाकिस्तान में शामिल होने का हर हथकंडा अपनाया गया। जब इतने से बात नहीं बनी तो उन्हें सेना का अध्यक्ष बनाने का भी ऑफर दिया गया था। लेकिन ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान ने दो टूक में उनके ऑफर को ठुकराते हुए जवाब दिया कि भले ही वे धर्म से मुसलमान हैं, लेकिन सबसे पहले हिन्दुस्तानी हैं। उन्होंने जवाब में लिखा कि भारत देश सबसे पहले है फिर बाद में धर्म है। उन्होंने कहा कि मैं अपनी भारत माता को नमन करता हूँ। गौरतलब है कि देश के बटवारे के बाद से ही पाकिस्तान किसी भी हालत में कश्मीर पर अपना कब्जा जमाना चाहता था और उसकी गिद्ध दृष्टि उसी समय से लगी हुई थी। बटवारा के मात्र दो महीना बाद ही पाकिस्तान कश्मीर में घुसपैठ करना शुरू कर दिया था। वह धीरे-धीरे अपनी फौज को आगे बढ़ा रहा था। ये वही ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान हैं जिन्होंने पाकिस्तान से कश्मीर को छीन कर भारत में मिलाने का काम किया। सन 1947-48 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में कश्मीर से पाकिस्तानियों को भगाने वाला शेर ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान ने सन 1948 ई. के नौशेरा के युद्ध में पाकिस्तानी सेना को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था। उसी समय से उन्हें ‘नौशेरा का शेर’ कहा जाने लगा । भारत का नौशेरा पर कब्जा के बाद पाकिस्तान को इतना खौफ हो गया था कि नौशेरा पर कब्जा से बौखलाए पाकिस्तान ने उनके सर के ऊपर 50 हजार रुपया का इनाम रखा था। याद रहे कि आज से 79 साल पहले यानी 1947 में यह बहुत बड़ी रकम होती थी। भारतीय फौज में पहले ‘राम राम’, अस्सलाम अलैकुम या ‘सत श्री अकाल’ जैसे शब्द का प्रयोग एक दूसरे को आदर व सम्मान देने के लिए किया जाता था। फौज में धार्मिक भावना को खत्म करने और राष्ट्र प्रेम को बढ़ावा देने के लिए नेताजी सुभाष चंद्र बोस के बहुत ही करीबी साथी इंडियन फौरन सर्विस (आई.एफ.एस.) से आए इंडियन नेशनल आर्मी (आई.एन.ए.) में सेवा देने वाले आबिद हसन सफरानी ने ही ‘जय हिन्द’ लिखा था। जिसे नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने स्वतंत्रता आंदोलन में शुरू किया था, किन्तु देश की आजादी के बाद फौज में ‘जय हिन्द’ कहने का विधवत प्रचलन ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान ने ही शुरू की थी। पाकिस्तान से कश्मीर छीनने के क्रम में वे नौशेरा को तो जीत लिए थे, लेकिन कश्मीर का झंगड़ एक ऐसा क्षेत्र था जहाँ से पाकिस्तानियों द्वारा फिर से घुसपैठ की ज्यादा सम्भावना थी। इसके लिए ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान ने कसम खाकर यह प्रण लिया था कि वे जब तक उसे नहीं जीत पाएंगे तब तक वह चारपाई (खाट) पर नहीं सोएंगे । इस तरह जब वह झंगड़ जीत गए तो उनके साथी फौजियों ने खुशी में चारपाई मंगवाई और वे उस पर आराम किए। ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान को जामिया मिलिया इस्लामिया नई दिल्ली यूनिवर्सिटी के संस्थापक सदस्य मोहम्मद मोख्तार अंसारी और भारत के पूर्व उप-राष्ट्रपति हामिद अंसारी का रिश्तेदार बताया जाता है। जबकि उत्तर प्रदेश के मऊ से पाँच बार के विधायक रहे दिवंगत मोख्तार अंसारी और वर्तमान में गाजीपुर के सांसद उनके भाई अफजाल अंसारी ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान को अपना नाना बताते आए हैं और उनकी जयंती और पुण्यतिथि के कार्यक्रम में ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान के नाम के साथ ब्रिगेडियर उस्मान अंसारी लिखते हैं। जबकि ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान बुनकर समाज अर्थात अंसारी समाज से नहीं थे, बल्कि वे मिल्की मुसलमान थे। जो कालांतर में सनातन धर्म के हिन्दू जाट से मुसलमान बने थे। याद रहे कि जाट से मुस्लिम बने मिल्की मुसलमानों को मुगल दौर में भूमि पर राजस्व अथवा टैक्स नही लिया जाता था। फिलहाल भारत में ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान के असल वंशज कनाडा में जाकर बस गए हैं । जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तानी सैनिकों से लड़ते हुए 03 जुलाई सन 1948 ई. को वे झांगड़ में शहीद हो गए थे। उन्होंने मात्र 36 साल की उम्र में शहादत पाई। उनकी आखरी रस्म अर्थात जनाजा व सुपुर्द -ए- खाक (अंत्येष्टि) जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी नई दिल्ली के कब्रिस्तान में किया गया है। 50 वीं पैराशूट ब्रिगेड रेजिमेंट के सैन्य संख्या ए.आई. 219 के ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान को 26 जनवरी सन 1950 ई. को मरणोपरांत देश के दूसरे सबसे बड़े सैनिक सम्मान महावीर चक्र (एम.वी.सी.) से सम्मानित किया गया। आज की युवा पीढ़ी, नेता और शासन-प्रशासन और सरकार ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान को भुलाकर बहुत कुछ खो रही है। ये नहीं भूलना चाहिए की वतन पर जान कुर्बान करने वाले एक ऐसे देशभक्त ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान में कुछ खाश बात थी तभी तो उनके पार्थिव शरीर (जनाजा) को रिसीव करने लिए खुद चलकर देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू पहुँचे हुए थे। इतना ही नही उस समय के तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड लु-ईस माउंटबेटन भी जनाजे में शामिल हुए थे। हम सब भारतीय ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान के त्याग, बलिदान एवं देशभक्ति को कभी नहीं भुला सकते हैं। जब तक सूरज चाँद रहेगा तब तक हम उन्हें नमन करते रहेंगे। अंत में मुझे यह लिखने में जरा भी संकोच नहीं की वर्तमान परिवेश में मुस्लिम समाज को संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा है, जो कि सही नही है। हाँ ये जरूर है कि अपवाद स्वरूप कोई एक दो मुस्लिम नाम का व्यक्ति कुछ गलत करता है तो उन्हें कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए। ऐसे लोग अपवाद स्वरूप हो सकते हैं। इसके लिए पूरे मुस्लिम समाज को ट्रोल करना या संदेह की नजर से देखना सरासर गलत है। जिस प्रकार एक मुसलमान फौजी अफसर ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान पाकिस्तान का इतना बड़ा ऑफर ठुकरा दिए। इससे बड़ी देशभक्ति की मिशाल क्या मिलेगी। जिन पर सम्पूर्ण भारतवासियों को गर्व है। भारत की आजादी से लेकर अब तक सैकड़ों नहीं बल्कि हजारों मुसलमानों ने अपनी जान की कुबार्नी देकर देशभक्ति का सबूत देते हुए भारत में रहकर मजहब से पहले वतन को नमन किया है। इसलिए आज हम सब भारतीयों को जात-पात, धर्म-मजहब से ऊपर उठ कर वतन पर जान निछावर करने वाले शहीद ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान को खेराज -ए- अकीदत (विनम्र श्रद्धांजलि) देते हुए यह प्रण लेना होगा कि हम सब आपस मे मिल कर देश को आगे बढ़ाने के लिए एकता का परिचय देते हुए मजहबी जंग से बचने का प्रयास करेंगे।

रोजनामा इंडो गल्फ़/एनाएतुल्लाह नन्हे




